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उग्घडिसुव गब्बिदेवय्या (११६०)

पूर्ण नाम: उग्घडिसुव गब्बिदेवय्या
वचनांकित : कूडल संगमदेवरल्लि बसवण्णा साक्षियागि
कायक (व्यवसाय): ’महामने’ का द्वारपालक

ज्ञान आओ, माया जाओ, कहकर दूर कर रहा हूँ।
विवेक आओ, करते हुए अविवेक जाओ कहकर दूर कर रहा हूँ।
निराकर आओ, साकार जाओ कहकर दूर कर रहा हूँ।
अलौकिक आओ लौकिक जाओ कहकर दूर कर रहा हूँ।
कूडलसंगमदेव में, बसवण्णा को जाननेवाले को प्रवेश देकर
नहीं जाननेवालों को बाहर जाओ कहकर रोक रहा हूँ / १५२८ (1528) [1]

उग्घडिसुव गब्बिदेवय्या (११६०) गब्बिदेवय्या बसवण्णा के घर ’महामने’ का द्वारपालक का कायक करते थे। ’कूडल संगमदेवरल्लि बसवण्णा साक्षियागि’ कूडलसंगमदेव में बसवण्णा साक्षी होकर अंकित से इनके १० वचन मिले हैं। अपने कायक की परिभाषा का उपयोग कर बडे सरल-सुंदर ढंग से वचन रचे हैं और उनमें हास्यप्रज्ञा, कायक-निष्ठा और बसव भक्ति व्यक्त हुई हैं।

भाव भ्रम में जो पड़े हैं वे न आये,
ज्ञानहीन लोग शिघ्र चले जाइये।
त्रिविध मल में पड़े, लड़ने-झगड़नेवाले दूर ही रहिए।
नित्य स्वयं का अनुभाव करने वाले आइए
परब्रह्म स्वरूप वाले आइए
एकलिंगनिष्टापर धृढ़मन वाले आइए
सन्मार्ग में रहने वाले, सत्क्रीयचारवाले आइए
यही मेरे लिए दिया गया कायक है
कूडलसंगमदेव में बसवण्णा से। / १५२९ (1529) [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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