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उरिलिंगदेव (११६०)

पूर्ण नाम: उरिलिंगदेव
वचनांकित : उरिलिंगदेव
कायक (व्यवसाय): विद्वान (पंडित)

अंतरंग को आवृत होकर
बहिरंग में दिखते हो ।
आँखों के छोर में मूर्ति बनकर
मन कि छोर में दर्शन देगे
मेरे ब्रह्मरंध्र में दिखने वाली परंज्योति
उरिलिंगदेव तुम्हीं हो। / १५३२ (1532) [1]

उरिलिंगदेव (११६०) उरिलिंगदेव ’शरणसति-लिंगपति’ भाव के वचनकार हैं। ’अवसे कंधार’ इनका स्थान है। यह सिवलेंक मंचय्या के शिष्य थे और पुलिगेरेय महालिंगदेव की गुरु परंपरा से संबंधित हैं। इनकी लिंगनिष्ठा की परीक्षा लेने विरोधी लोक झांपडी को आग लगा देते हैं, तब भी हय विचलित न होकर इष्टलिंगपूजा में मग्न होकर महिमा दिखाते हैं। विद्वान दलित वचनकार उरिलिंगपेद्दि इनके शिष्य हैं।

प्रियतम का रूप मेरी आँखों में भरी थी
प्रियतम के वचन मेरे कानों में भरे थे।
प्रियतम की सुगंध मेरे नासिक में भरी थी
प्रियतम का चुंबन मेरी जिव्हा में भरा था।
प्रियतम का आलिंगन मेरे अंतरंग बहिरंग में भरा था।
प्रियतम का प्रेम मेरे मन में भरा था
मिलन सुख पाया मैं उरिलिंगदेव का। / १५३९ (1539) [1]

उरिलिंगदेव ने अपने नाम को ही वचनांकित बना लिया था और इनके ४८ वचन उपलब्ध हुए हैं। सभी में लिंगविकलावस्था प्रकट हुई है। सरल भाषा, मधुर भाव और आत्मीय शैली वचनों का वैशिष्ट है।

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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