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उरिलिंगपेद्दि की पत्नि काळव्वे (११६०)

पूर्ण नाम: काळव्वे
वचनांकित : उरिलिंगपेद्दिगळरस

जो सत्य कायक नहिं करते वे भक्त नहीं।
जो सत्य शुद्ध नहीं वह कायक नहीं।
लोभ भव का बीज है
लोभरहितता से नित्य मुक्ति है
उरिलिंग पेद्दिगळरस में यह भक्ती आसान नहिं देखों माँ। /१२९८ (1298) [1]

’तूतर’ पेड़ की लकड़ी जैसे जलनेवाला भक्त है क्या?
वंचना की कमाई से सेवा करनेवाला भक्त है क्या?
भक्तों के कुल की निंदा करनेवाला भक्त है क्या?
निंदया शिवभक्तानां कोटि जन्मानी सूकर:
सप्त जन्मानी भवेत्‌ कूष्ठी दासीगर्भेषु जायते॥
अत: अपने प्राण पर आपत्ति हो तो इनका संग छोड़ना चाहीए।
यदि न छोड़ेगा तो उरिलिंगपेद्दिगळरस मानेगा नहीं भाई। /१२९९ (1299) [1]

उरिलिंगपेद्दि की पत्नि काळव्वे (११६०) शूद्र मूल के वचनकार उरिलिंगपेद्दि की पत्नि हैं काळव्वे। इससे ज्यादा इनके बारे में जीवन वृत्तांत विवरण नहीं मिलता है। जब तो इनके रचे १२ वचन प्राप्त हैं। इनका वचनांकित है ’उरिलिंगपेद्दिगळरस’। भक्त का स्वरूप, लक्षण, व्रताचरण का महत्व, प्रसाद की महिमा, कायक-निष्ठा, जाति-कुल के बारे में निष्ठुर विडंबना आदि इनके वचनों में पाये जानेवाले प्रमुख अंश हैं।

व्रताचरण तो श्रेष्ठ रत्न है।
व्रताचरण तो श्रेष्ठ मोती है।
व्रताचरण तो श्रेष्ठ कला है।
व्रताचरण तो श्रेष्ठ प्रसाद है।
व्रतभ्रष्ट को उरिलिंगपेद्दिगळरस न चाहेगा।/ १३०१ (1301) [1]

References

[1] Vachana number in the book "VACHANA" (Edited in Kannada Dr. M. M. Kalaburgi), Hindi Version Translation by: Dr. T. G. Prabhashankar 'Premi' ISBN: 978-93-81457-03-0, 2012, Pub: Basava Samithi, Basava Bhavana Benguluru 560001.

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